Sunday, October 5, 2008

देश बड़ा या धर्म


बीते कुछ रोज़
रास्ते में दिखी
मेरी सहेली शहरोज
ख़ुद से बतिया रही थी
शायद कहीं जा रही थी
मुझे देख कर खिली
पास आकर मुझसे मिली
मैंने पूछा कहाँ जा रही हो
उसने बताया कि
बटला में जो मुठभेड़ हुई थी
वह थी बिल्कुल फर्जी
हमारी कौमवाले लगायेंगे

पुलिस के विरुद्ध अर्जी
ये हमारी कौम को

बदनाम कर रहे हैं
धीरे-धीरे हमारा

काम-तमाम कर रहे हैं
मैंने उससे पूछा कि
तुम देश को
बड़ा मानती हो या धर्म को
वह हो गई शांत
मेरा मन हुआ अशांत
क्योंकि उसकी आँखों में
जो चलचित्र चल रहा था
उसमें देश को एक ओर
धकिया कर धर्म
उससे गले मिल रहा था।