Sunday, October 5, 2008
देश बड़ा या धर्म
बीते कुछ रोज़
रास्ते में दिखी
मेरी सहेली शहरोज
ख़ुद से बतिया रही थी
शायद कहीं जा रही थी
मुझे देख कर खिली
पास आकर मुझसे मिली
मैंने पूछा कहाँ जा रही हो
उसने बताया कि
बटला में जो मुठभेड़ हुई थी
वह थी बिल्कुल फर्जी
हमारी कौमवाले लगायेंगे
पुलिस के विरुद्ध अर्जी
ये हमारी कौम को
बदनाम कर रहे हैं
धीरे-धीरे हमारा
काम-तमाम कर रहे हैं
मैंने उससे पूछा कि
तुम देश को
बड़ा मानती हो या धर्म को
वह हो गई शांत
मेरा मन हुआ अशांत
क्योंकि उसकी आँखों में
जो चलचित्र चल रहा था
उसमें देश को एक ओर
धकिया कर धर्म
उससे गले मिल रहा था।
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
7 comments:
very good poem.
kavita suna rahi ho ya hakikat bata rahi ho.
बहुत सुंदर /पिछली रचना से ज़्यादा सशक्त /काव्य संरचना में लोक कल्याण और राष्ट्रहित हो तो उसका आनंद ही कुछ और है इसी तरह काव्य साधना करते रहो / काव्य स्रजन की तपश्चर्या भी सरस्वती की आराधना है
बहुत सुंदर /पिछली रचना से ज़्यादा सशक्त /काव्य संरचना में लोक कल्याण और राष्ट्रहित हो तो उसका आनंद ही कुछ और है इसी तरह काव्य साधना करते रहो / काव्य स्रजन की तपश्चर्या भी सरस्वती की आराधना है
sateek,vilkul sateek likha hai aapne,aaj-kal pata nahi kuch muslim logo ko kya ho gaya hai, unhe har bat apne virudh hoti lagti hai, Jab kahi aatanki ghatnaye hoti hai to unke muh me juban nahi hoti hai aur jab atanki pakde jate hai to unhe bachane ke liye dharm ko beech me le aate hai,
Kashmeer se sare hindu bhaga diye gaye tab ye muslim log kaha the,
jab godhara me train me hindu jalaye gaye tab ye muslim kahan the, apne aap jab ye muslin ghinauni kartute karte hai tab bhool jate hai ki bure kam ka bura nateeza hota hai.
दीपावली की हार्दिक शुभ कामनाएं /दीवाली आपको मंगलमय हो /सुख समृद्धि की बृद्धि हो /आपके साहित्य सृजन को देश -विदेश के साहित्यकारों द्वारा सराहा जावे /आप साहित्य सृजन की तपश्चर्या कर सरस्वत्याराधन करते रहें /आपकी रचनाएं जन मानस के अन्तकरण को झंकृत करती रहे और उनके अंतर्मन में स्थान बनाती रहें /आपकी काव्य संरचना बहुजन हिताय ,बहुजन सुखाय हो ,लोक कल्याण व राष्ट्रहित में हो यही प्रार्थना में ईश्वर से करता हूँ ""पढने लायक कुछ लिख जाओ या लिखने लायक कुछ कर जाओ "" कृपा बनाए रखें /
Sahi likha hai aapne, dharm ab dosti jaise swabhawik rishton ke bhi beech aane laga hai.Maga ashayein abhi bhi khatm nahi hui hain.swagat aapka mere bhi blog par.
Post a Comment