Saturday, September 27, 2008

सुनिये साहिबान


सुनिये साहिबान,

मेहरबान, कदरदान

भारत के नौजवान,

मेरे भाई जान

आतंकियों का कोई

धर्म नहीं होता,

उनमें दया का

कोई मर्म नहीं होता

वो लेना चाहते हैं

सभी की जान

चाहे हिंदू हो

या फ़िर मुसलमान।

6 comments:

Sumit Pratap Singh said...

वाह बहना क्या कविता लिखी। बहुत बधाई।

Antara said...

Bahut hi khubsurat kavita hai.

वनिता said...

nice poem.

Anonymous said...

आतंकियों का कोई धर्म नहीं होता,
उनमें दया का कोई मर्म नहीं होता
वो लेना चाहते हैं सभी की जान
चाहे हिंदू हो या फ़िर मुसलमान।

aaj ki paristhiti me ek sundar aur sandesh deti hui rachana.

vishal

BrijmohanShrivastava said...

छोटी सी किंतु अच्छी रचना /बिटिया मुझे पढने में बहुत दिक्कत हुई /ये लाल कलर से लिखा आप ख़ुद भी देखना हम जैसे कुछ बुजुर्ग पाठकों को दिक्कत आ सकती है

शैली said...

wah kya rachna hai.