सुनिये साहिबान,
मेहरबान, कदरदान
भारत के नौजवान,
मेरे भाई जान
आतंकियों का कोई
धर्म नहीं होता,
उनमें दया का
कोई मर्म नहीं होता
वो लेना चाहते हैं
सभी की जान
चाहे हिंदू हो
या फ़िर मुसलमान।
मैं इस ब्लॉग द्वारा अपनी व अपने भाई सुमित प्रताप सिंह की रचनाएँ आपके समक्ष प्रस्तुत करुँगी। आशा है आपको अच्छी लगेंगी।
6 comments:
वाह बहना क्या कविता लिखी। बहुत बधाई।
Bahut hi khubsurat kavita hai.
nice poem.
आतंकियों का कोई धर्म नहीं होता,
उनमें दया का कोई मर्म नहीं होता
वो लेना चाहते हैं सभी की जान
चाहे हिंदू हो या फ़िर मुसलमान।
aaj ki paristhiti me ek sundar aur sandesh deti hui rachana.
vishal
छोटी सी किंतु अच्छी रचना /बिटिया मुझे पढने में बहुत दिक्कत हुई /ये लाल कलर से लिखा आप ख़ुद भी देखना हम जैसे कुछ बुजुर्ग पाठकों को दिक्कत आ सकती है
wah kya rachna hai.
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